अनुरोध / महेंद्रभटनागर

परिपक्व आम्र हूँ —
तीव्र पवन के झोंकों से
कब गिर जाऊँ!


आतुर है
धरती की कोख
प्रसविनी,
शायद —
जीवन फिर पाऊँ!



आया तो
और मधुर रस दूंगा,
बरस-बरस दूंगा!


अपने प्रिय सपनों में
रखना मुझे सुरक्षित,
भूली-बिसरी यादों में
चिर-संचित!

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बहुत से काम हैं
लिपटी हुई धरती को फैला दें
दरख़्तों को उगाएँ, डालियों पर फूल महका दें
पहाड़ों को क़रीने से लगाएँ
चाँद लटकाएँ
ख़लाओं के सरों पे नीलगूँ आकाश फैलाएँ
सितारों को करें रौशन
हवाओं को गति दे दें
फुदकते पत्थरों को पंख देकर नग़्मगी दे दें
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अँखड़ियों को रोशनी दे दें
सड़क पे डोलती परछाइयों को ज़िन्दगी दे दें
खुदा ख़ामोश है,
तुम आओ तो तख़लीक़ हो दुनिया
मैं इतने सारे कामों को अकेले कर नहीं सकता
किसी को टूट के चाहा, किसी से खिंच के रहे दुखों की राहतें झेलीं, खुशी के दर्द सहे कभी बगूला से भटके कभी नदीं से बहे कहीं अँधेरा, कहीं रोशनी, कहीं साया तरह-तरह के फ़रेबों का जाल फैलाया पहाड़ सख्त था, वर्षों में रेत हो पाया।
रुख़्सत होते वक़्त उसने कुछ नहीं कहा लेकिन एयरपोर्ट पर अटैची खोलते हुए मैंने देखा मेरे कपड़ों के नीचे उसने अपने दोनों बच्चों की तस्वीर छुपा दी है तअज्जुब है छोटी बहन होकर भी उसने मुझे माँ की तरह दुआ दी है।