Thursday, April 19, 2012 / लेबल: Ank 20Apr2012
Ank 20Apr2012
समकालीन कहानियों में भारत से पावन की कहानी- फेसबुक मित्र
दिल्ली एयरपोर्ट। सुबह आठ बजकर पचास मिनट।
मैं ठीक समय पर पहुँच गया था।
दिल्ली एयरपोर्ट। सुबह आठ बजकर पचास मिनट।
मैं ठीक समय पर पहुँच गया था।
/ लेबल: प्रेमकुमार, शहरयार, साक्षात्कार
/ लेबल: अभिषेक तिवारी, सप्ताह का कार्टून
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पिछले अंकों में....
समकालीन कहानियों में भारत से पावन की कहानी- फेसबुक मित्र
सुमन गिरि का प्रेरक प्रसंग
काँच की बरनी और दो प्याले चाय*
रचना प्रसंग में विजय कुमार से जानें
क्या कविता का अनुवाद संभव है
*
आज सिरहाने इला प्रसाद का
कहानी संग्रह- उस स्त्री का नाम*
पुनर्पाठ में देखें-
कोहिनूर का घर गोलकुंडा
बहुत से काम हैं
लिपटी हुई धरती को फैला दें
दरख़्तों को उगाएँ, डालियों पर फूल महका दें
पहाड़ों को क़रीने से लगाएँ
चाँद लटकाएँ
ख़लाओं के सरों पे नीलगूँ आकाश फैलाएँ
सितारों को करें रौशन
हवाओं को गति दे दें
फुदकते पत्थरों को पंख देकर नग़्मगी दे दें
लबों को मुस्कुराहट
अँखड़ियों को रोशनी दे दें
सड़क पे डोलती परछाइयों को ज़िन्दगी दे दें
खुदा ख़ामोश है,
तुम आओ तो तख़लीक़ हो दुनिया
मैं इतने सारे कामों को अकेले कर नहीं सकता
किसी को टूट के चाहा, किसी से खिंच के रहे
दुखों की राहतें झेलीं, खुशी के दर्द सहे
कभी बगूला से भटके
कभी नदीं से बहे
कहीं अँधेरा, कहीं रोशनी, कहीं साया
तरह-तरह के फ़रेबों का जाल फैलाया
पहाड़ सख्त था, वर्षों में रेत हो पाया।
रुख़्सत होते वक़्त
उसने कुछ नहीं कहा
लेकिन एयरपोर्ट पर
अटैची खोलते हुए
मैंने देखा
मेरे कपड़ों के नीचे
उसने
अपने दोनों बच्चों की तस्वीर छुपा दी है
तअज्जुब है
छोटी बहन होकर भी
उसने मुझे माँ की तरह दुआ दी है।
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