Thursday, April 19, 2012 / लेबल:

Ank 20Apr2012

समकालीन कहानियों में भारत से पावन की कहानी- फेसबुक मित्र
दिल्ली एयरपोर्ट। सुबह आठ बजकर पचास मिनट।
मैं ठीक समय पर पहुँच गया था।

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तूफ़ान में दस्तक (कहानी ) खुर्शीद हयात


बाहर के सारे दरवाज़े बंद थे और अन्दर कमरे में अशांति थी . शान्ति की तलाश जारी थी और हर एक का चेहरा घबराया घबराया सा था . शायद कि वह किसी बड़े खतरे के इंतज़ार में थे , अचानक बाहरके दरवाज़े पे दस्तक हुयी और सब लोग हैरान हो कर खामोश हो गए .

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अगर हृदय पत्थर का होता [कविता] - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"


अगर हृदय पत्थर का होता...
*
खाकर चोट न किंचित रोता,
दुःख-विपदा में धैर्य न खोता.
आह न भरता, वाह न करता-
नहीं मलिनता ही वह धोता..
अगर हृदय पत्थर का होता...

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यह दौर बड़ी शायरी का दौर नहीं है [डॉ. शहरयार से बातचीत] [डॉ. शहरयार को श्रद्धांजलि स्वरूप विशेष प्रस्तुति] - डॉ. प्रेमकुमार

उर्दू के मशहूर शायर अखलाक मोहम्म्द खान 'शहरयार' का सोमवार देर शाम निधन हो गया. यह खबर साहित्य जगत के लिए सदमे से कम नहीं। 'शहरयार' 76 साल के थे और पिछले साल उन्हें 2008 के साहित्य के ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया था.

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मोबाइल अनुवाद [तकनीकी आलेख] - डॉ. काजल बाजपेयी

मोबाइल अनुवाद मोबाइल फोन, पॉकेट पीसी, पीडीए सहित, हाथ से आयोजित उपकरणों के लिए मशीन अनुवाद सेवा है। यह काम करने के लिए अभिकलनात्मक भाषाविज्ञान और यंत्र के संचार माध्यमों (इंटरनेट संपर्क या एसएमएस) के क्षेत्र में कंप्यूटर प्रोग्रामिंग पर निर्भर करता है।

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अनुरोध / महेंद्रभटनागर

परिपक्व आम्र हूँ —
तीव्र पवन के झोंकों से
कब गिर जाऊँ!


आतुर है
धरती की कोख
प्रसविनी,
शायद —
जीवन फिर पाऊँ!

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पिछले अंकों में....

समकालीन कहानियों में भारत से पावन की कहानी- फेसबुक मित्र
सुमन गिरि का प्रेरक प्रसंग काँच की बरनी और दो प्याले चाय*
रचना प्रसंग में विजय कुमार से जानें क्या कविता का अनुवाद संभव है *
आज सिरहाने इला प्रसाद का कहानी संग्रह- उस स्त्री का नाम*
पुनर्पाठ में देखें- कोहिनूर का घर गोलकुंडा
बहुत से काम हैं
लिपटी हुई धरती को फैला दें
दरख़्तों को उगाएँ, डालियों पर फूल महका दें
पहाड़ों को क़रीने से लगाएँ
चाँद लटकाएँ
ख़लाओं के सरों पे नीलगूँ आकाश फैलाएँ
सितारों को करें रौशन
हवाओं को गति दे दें
फुदकते पत्थरों को पंख देकर नग़्मगी दे दें
लबों को मुस्कुराहट
अँखड़ियों को रोशनी दे दें
सड़क पे डोलती परछाइयों को ज़िन्दगी दे दें
खुदा ख़ामोश है,
तुम आओ तो तख़लीक़ हो दुनिया
मैं इतने सारे कामों को अकेले कर नहीं सकता
किसी को टूट के चाहा, किसी से खिंच के रहे दुखों की राहतें झेलीं, खुशी के दर्द सहे कभी बगूला से भटके कभी नदीं से बहे कहीं अँधेरा, कहीं रोशनी, कहीं साया तरह-तरह के फ़रेबों का जाल फैलाया पहाड़ सख्त था, वर्षों में रेत हो पाया।
रुख़्सत होते वक़्त उसने कुछ नहीं कहा लेकिन एयरपोर्ट पर अटैची खोलते हुए मैंने देखा मेरे कपड़ों के नीचे उसने अपने दोनों बच्चों की तस्वीर छुपा दी है तअज्जुब है छोटी बहन होकर भी उसने मुझे माँ की तरह दुआ दी है।